Thursday, October 7, 2010

Bichadta Bachpan

तरक्की की इस राह मैं
हम कितने दूर चले आये
पीछे छुट गयी सारे एहसास
बचपन और यादें

अभी भी होती है नयी सुबह
पर बिछड़ गयी  चिड़ियों चहक
अभी भी होती है शाम
पर नहीं रोते ख्याल से  दोस्ती छुटने  की

रास्तों से नहीं चुनते
प्यारे फूल ,पत्ते या कंकर
नहीं बनाते रेत मैं ईमारत
नहीं होती है कुछ बिछड़ने  का दार

नाहीं बनाते कहानी कोई
नाही भरते रंग असमान मैं
नाही बातें करते है
हर इस ज़र्रा से,न हे कोई अपनापन

हारते हुए हालत से कितने टूट जाते हैं
हले की तरह क्यूँ नाहीं लगता ??
क्यूँ नाहीं सोचते माँ की अंचल मैं कोई
 मुस्किल या मुसीबत पास नाहीं भटकता.

कल भी हल मुसीबत का
मिलते थे एक भरोषा की लहर से
आज मुसीबतों की वजह  ही
अपनों पे  भरोषा है

 कल एक हलकी सी मुस्कराहट से
सबको अपना बना लेते थे
अब भी मुस्कराहट अति है
तो उसके पीछे छुपि  कोई कारन होती

चाहकर भी नाहीं लौटा पाती
वो बचपन के दिन
बस एक आह  निकलती है
उन यादों के एहसास के बिन

Yaad hai mujhe ...

तेरा प्यर तेरी मुस्कराहट तेरा पलना याद है मुझे।  प्यारी सी झप्पी मीठी सी पप्पी  मीठा हर पल याद है मुझे।  राह दिखना बातें समझाना ...